The ghazal — a form of longing, each sher a world unto itself.
यह रचना उस बेबसी और टूटन का आईना है जहाँ गैरों के जख्मों पर तो मरहम मिल जाते हैं, मगर अपनों के वार इंसान को अंदर से फना कर देते हैं। हर संवेदनशील और भावुक दिल को छू जाने वाली एक बेहद असरदार पेशकश।
रिश्तों की भीड़भाड़ में कभी-कभी एक ऐसा दौर भी आता है जहाँ हमसफ़र तो नहीं मिलते, पर रूह को छू लेने वाले कुछ हमनवाज़ और राज़दार मिल जाते हैं। उम्र भर के वादों के बोझ से आज़ाद, बस उस एक हसीं लम्हे और कश्ती-ए-दिल के साहिल की तलाश को बयां करती, यह खूबसूरत ग़ज़ल
मोहब्बत में मिलने वाले ज़ख्मों को खामोशी से सीने में दबाए रखना और दुनिया के सामने हर दर्द को मुस्कान के पर्दे के पीछे छुपा लेना—यही किसी सच्चे आशिक़ की सबसे बड़ी दास्ताँ होती है। तन्हाइयों के अंधेरे में उम्मीद का एक दिया जलाए रखने और अपनों के दिए हर धोखे के बावजूद हर रिश्ते को बचाने की जद्दोजहद बयां करती है,
"कहते हैं कि सबसे गहरे दर्द वो होते हैं जो होंठों तक नहीं आते, बस सीने के भीतर किसी सुलगते हुए अंगारे की तरह सुलगते रहते हैं। दुनिया को इंसान का सिर्फ मुस्कुराता हुआ चेहरा दिखाई देता है, लेकिन उस हँसी के पीछे क्या-क्या बवंडर छिपे हैं, इसकी ख़बर हर किसी को नहीं होती। खामोशी के इसी समंदर और भीतर सुलगते सैलाब को बयां करती,
"रिश्तों की दुनिया में कुछ दर्द ऐसे होते हैं जो आवाज़ नहीं करते, बस भीतर ही भीतर इंसान को तोड़कर रख देते हैं। जब कोई अपना, जिसे आपने अपनी दुआओं और मन्नतों से तराशा हो, अचानक बेगाना हो जाए और बेरुखी की हर हद पार कर दे—तब ज़ुबान पर शब्द नहीं, बस सिसकियाँ रह जाती हैं। अपनों के इसी वीरान कर देने वाले रवैये और गहरे जख्मों को बयां करती, मेरी यह नई ग़ज़ल..."
यह रचना इंसान के उस दौर की तस्वीर खींचती है जहाँ परिपक्वता, दृष्टि और समझ (सह-चश्म-पा) होने के बावजूद ज़िंदगी अचानक बेबसी और अनिश्चितता की "अंधी गली" जैसी प्रतीत होने लगती है। यह उम्मीद और निराशा, उजाले और अँधेरे, तथा वफ़ा और तन्हाई के बीच झूलती हुई मानवीय जिजीविषा का काव्य-रूप है।
यह ग़ज़ल विरह, तन्हाई, और ज़िंदगी के थपेड़ों के बीच जीने वाले एक संवेदनशील इंसान की दास्तान-ए-बयान है। इसमें दर्द की शिद्दत के साथ-साथ उसे सहेजकर जीने का एक अनूठा हौसला नज़र आता है।
यह ग़ज़ल झूठे रिश्तों के दर्द, अपनों की बेरुख़ी, सहनशीलता (ज़र्फ़) और इस दौर के कड़वे सच को बेहद मार्मिक अंदाज़ में बयां करती है। जब अपने ही ज़ख्म दें और झूठ का बोलबाला हो, तब एक इंसान के भीतर जो तन्हाई और घुटन पैदा होती है, यह रचना उसकी सटीक दास्तान है।
यह रचना अत्याचार, अन्याय और मरते हुए ज़मीर पर किया गया एक बेहद तीखा और साहसिक प्रहार है। यह कविता मासूमों के प्रति हो रहे अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाती है और अत्याचारियों को उनके कर्मों के परिणाम और अंतरात्मा के अदालत की याद दिलाती है।
यह रचना समाज के दोहरे चरित्र, झूठी शराफ़त के मुखौटों और रोशनी की आड़ में छिपे अपराधों पर एक तीखा प्रहार करती है। यह कविता उजालों और अँधेरों के पारंपरिक दृष्टिकोण को बदलकर एक कड़वी सामाजिक सच्चाई को उजागर करती है।
यह रचना स्नेह, आशीर्वाद और पवित्र दुआओं का एक ऐसा गुलदस्ता है, जिसमें अपनों की खुशी और उनकी लंबी उम्र के लिए दिल की गहराइयों से कामना की गई है। इस कविता का हर एक शेर ज़िंदगी में बहार, खुशियों की नेमतों और हर कदम पर कामयाबी की दुआ मांगता है। 'उठाऊँ जब भी दुआ के लिए मैं हाथ शशि, खुदा से आपकी हर एक खुशी का पैगाम आए' पंक्तियाँ किसी अपने के प्रति अगाध प्रेम और सच्ची प्रार्थना का सबसे सुंदर प्रतीक हैं।
यह ग़ज़ल रिश्तों की कद्र, नज़रअंदाज़ किए जाने की टीस और अकेलेपन की गहराई को बहुत सादगी और असरदार अंदाज़ में पिरोती है। जब अपनों की बेरुख़ी से दिल टूटता है, तो इंसान दूसरों से आस छोड़कर अपने ही दर्द का हमराज़ बन जाता है। दुनिया की सच्चाई और दिखावे पर तीखा तंज कसती यह ग़ज़ल अंत में यह संदेश देती है कि कैसे दिल के गहरे ज़ख़्म ही गीतों, साज़ों और शायरी की शक्ल अख्तियार कर लेते हैं।
यह ग़ज़ल ज़िंदगी की धूप में जलते-जलते थक चुके एक मुसाफ़िर की दास्तान है। इसमें उस बेबसी और गहरे दर्द को बयां किया गया है जहाँ हर कदम एक बोझ बन जाता है, उम्मीद के दीये बुझ जाते हैं और इंसान मौत को भी एक सुकून भरी राहत की तरह देखने लगता है। 'उम्र सारी बीत गई जलते-जलते' पंक्ति पूरी ज़िंदगी के संघर्ष और अधूरे सपनों का एक शाश्वत सार है।
मौसम कितना भी ठंडा हो, जब दिल में किसी ख़ास का एहसास रहता है तो हर हवा का झोंका एक मीठी याद बन जाता है। ख़ामोशी, हवाएँ और सिर्फ़ तुम्हारा ख़याल।
हूँ मैं भी आशिक़, तुम भी हो माशूक़ मेरे
नज़र लगती है उस चेहरे को देखकर
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार, या इलाही यह माजरा क्या है
हमको मिटा सके यह ज़माने में दम नहीं
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता
वक़्त ने किया क्या हसीन सितम, तुम रहे न तुम, हम रहे न हम
इश्क़ में हमने क्या-क्या न देखा, ज़ुल्म देखा, जफ़ा देखा
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक
दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है
दाग़ वो दिल है जिसमें तेरी याद है
क्या जानिए क्या है, यह दिल का मामला
कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती
सर में सौदा भी नहीं, दिल में तमन्ना भी नहीं
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है — आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
रेख़्ते के तुम ही उस्ताद नहीं हो ग़ालिब — कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था
दिल ने तेरी तमन्ना में क्या-क्या नहीं किया
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी
उल्टा ज़माना हो गया है सारा — अब कोई किसी का नहीं यारा
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
मुझसे पहली-सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे — बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या — आगे आगे देखिए होता है क्या
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
लाई हयात आए, क़ज़ा ले चली चले
उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं दाग़
ग़ज़ल उर्दू और हिंदी साहित्य की सबसे प्रिय काव्य विधा है। इसकी संरचना, इतिहास और भावनात्मक गहराई को समझें।
साहिर लुधियानवी ने हिंदी फ़िल्मों के गीतों को साहित्यिक गरिमा दी। "तलख़ियाँ" से "कभी कभी" तक उनकी शायरी का सफ़र।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी में प्रेम और क्रांति का अद्भुत संगम है। उनकी नज़्में और ग़ज़लें आज भी लाखों दिलों को छूती हैं।
मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी के सर्वश्रेष्ठ शायरों में से एक हैं। उनकी शायरी में जीवन का दर्शन, प्रेम की पीड़ा और ईश्वर से संवाद है।
गुलज़ार की शायरी में रोज़मर्रा की ज़िंदगी के बिम्ब हैं — धूप, बारिश, बचपन और यादें। उनकी भाषा सरल है लेकिन अर्थ गहरे हैं।
कैफ़ी आज़मी की शायरी में स्त्री की पीड़ा, सामाजिक न्याय और प्रगतिशील विचारों का अद्भुत संगम है। उनकी नज़्म "औरत" उर्दू साहित्य की मील का पत्थर है।
अल्लामा इक़बाल की शायरी में "ख़ुदी" (self-realization) का दर्शन है। उनकी "शिकवा", "जवाब-ए-शिकवा" और "बाल-ए-जिब्रील" उर्दू साहित्य की अमर कृतियाँ हैं।
मुशायरा उर्दू-हिंदी काव्य की जीवंत परंपरा है। जानें कैसे एक मुशायरे में शायर और श्रोता मिलकर शायरी का जादू बनाते हैं।
ग़म-ए-हस्ती का असद किससे हो जुज़ मर्ग इलाज
हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है
फूलों का रंग देख, पत्तों की हरी बात सुन
बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ, मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ
दोनों जहाँ तेरी मोहब्बत में हार के
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
एक नज़र बेमेहर निगाह, दिल को हज़ार ज़ख़्म दे गई
यह न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए
रंज से ख़ूगर हुआ इंसान तो मिट जाता है रंज
इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश ग़ालिब
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यों
फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया, दिल जिगर तश्ना-ए-फ़र्याद आया
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
मानवता के पतन और इस दौर की कड़वी सच्चाई को बयां करती हुई एक गहरी और दर्दभरी ग़ज़ल
इस शाम के ढलते नज़ारें और सिंदूरी क्षितिज पर आधारित
अहंकार और गुरूर के उस दौर पर करारा प्रहार करती शशि ऐरी जी की यह नज़्म—"जो खुद को खुदा समझते हैं"—इंसानी फानी वजूद और सच्चाई का आइना दिखाती है। मिट्टी से बने इस शरीर की नश्वरता और जिंदगी की सच्चाई को बयान करती है
जवानी के उल्लास, महफ़िल के रंग और इश्क़ के खुमार में डूबी शशि ऐरी जी की यह ग़ज़ल—"शाम जवान और रात हसीन"—दिल के सुकूँ और हसीन लम्हों को बयां करती है।
दर्द, तन्हाई और अपनों को बचाने के लिए खुद को आंसुओं के समंदर में डुबो देने की दास्ताँ कहती है यह ग़ज़ल—"मैं तो पीता न था, बस ग़म भुलाने को पी गया"—दिल की गहराइयों को झकझोर देती है।
जब मोहब्बत रूह में इस तरह बस जाए कि धड़कनों के शोर का इज़हार भी बेमानी लगने लगे, तब ज़िंदगी के विस्तार की ज़रूरत नहीं रहती। यह ग़ज़ल उस मुकाम की दास्तान है जहाँ मंज़िलों की फिक्र नहीं, बल्कि सफ़र की खूबसूरती में खो जाने का फ़ैसला है। 'फ़ना' (मिट जाने) की तैयारी और हर ज़ख्म को चुपचाप ओढ़ लेने का यह अंदाज़, उन लोगों के लिए है जिन्होंने प्रेम में खुद को पूरी तरह मिटा दिया है।
कभी-कभी ज़िंदगी के सफ़र में कोई इंसान एक ऐसे मोड़ पर मिलता है, जहाँ से सारे दर्द धुंधले पड़ जाते हैं। यह ग़ज़ल उसी जादुई मुलाक़ात का अक्स है, जहाँ आँखों की मदहोशी और एक खामोश इकरार, दिल के पुराने ज़ख्मों के लिए मरहम बन गया। जब आप साहिल पर खड़े होकर लहरों से उलझ रहे हों, और कोई ख़्वाब बनकर आपके पास आ जाए—तो फिर शिकायतों का गुंजाइश ही कहाँ बचती है? यह ग़ज़ल प्यार की उस मासूमियत और इत्मीनान की दास्तान है, जहाँ 'दर्द' और 'सुकून' के बीच का फासला मिट जाता है।
जहाँ अच्छाई को कमजोरी और साफ़दिली को गुनाह माना जाने लगे, वहाँ इंसान का वजूद क्या? यह ग़ज़ल समाज के उस दोहरे चेहरे को बेनकाब करती है, जहाँ मतलब निकलने तक 'फ़रिश्ते' कहे जाते हैं और काम निकलते ही नज़रें चुरा ली जाती हैं। काँच और पत्थर को एक तराजू में तोलने वाले इस दौर में, शराफ़त का रास्ता कितना कठिन है, इसी का आईना है यह नज़्म।
कुछ बातें लफ़्ज़ों में कभी नहीं ढलतीं, वे बस आहों और सन्नाटों में सिमट कर रह जाती हैं। यह ग़ज़ल उस अदृश्य संघर्ष को उजागर करती है, जहाँ दुनिया केवल एक हंसता हुआ चेहरा देखती है, जबकि निगाहों में बिखरा हुआ सन्नाटा कैद रहता है। जब इश्क़ किसी और की दुआओं में बस जाए और वफ़ा की कश्ती लहरों के ख़ौफ़ में खो जाए, तो सिर्फ़ एक ही रास्ता बचता है—ज़माने की नफ़रत के बीच मोहब्बत का चिराग जलाना। यह ग़ज़ल एक ऐसे ही टूटकर फिर से संवरने वाले मुसाफ़िर की कहानी है।
इश्क महज़ एक जज़्बात नहीं, बल्कि एक ऐसा धागा है जिसे चाहकर भी तोड़ा नहीं जा सकता। यह ग़ज़ल उस शायर की आवाज़ है जो हक़ीक़त की उलझनों के बावजूद अपने जज़्बातों के दरिया को बहने से नहीं रोक सकता। जब लफ़्ज़ लहू से लिखे जाएं, तो वक्त का पहिया भी उन्हें मिटा नहीं सकता। यह नज़्म उस दृढ़ निश्चय का प्रतीक है कि एक बार जो इंसान कागज़ पर उतर आए, तो फिर खुद को पीछे मोड़ने की गुंजाइश बाकी नहीं रहती।
"ख्वाबों में भी गुनहगार..." — किसी का ऐसा नज़रिया, जहाँ आपकी मोहब्बत उनके लिए महज एक गुनाह हो। यह नज़्म उन दोहरे मिज़ाजों को बेनकाब करती है जो पल में शराफ़त ओढ़ते हैं और पल में बगावत पर उतर आते हैं। यदि आपने भी कभी किसी ऐसे रिश्ते को झेला है जहाँ वफ़ा सिर्फ एक रस्म बन गई हो, तो यह ग़ज़ल आपकी खामोशी को आवाज़ देगी।
कुछ राज़ इतने भारी होते हैं कि उनके बोझ से सांसें भी घुटने लगती हैं यह ग़ज़ल उन दबी हुई हसरतों और खामोश चीखों की कहानी है, जो हक़ीक़त की ऊंची दीवारों के पीछे कैद हैं। जब दुआएं थक जाएं और ज़मीं पैरों के नीचे से खिसकने लगे, तब इंसान खुद से ही छुपने लगता है। एक ऐसी बेबसी जिसे शब्दों में पिरोना, खुद को थोड़ा हल्का करने की कोशिश जैसा है।
दर्द को 'दाद' और सोज़ को 'साज़' में बदल देने का हुनर हर किसी के पास नहीं होता। यह ग़ज़ल एक ऐसे मुसाफ़िर की कहानी है, जिसने भीड़ में अकेले चलकर अपनी 'परवाज़' (उड़ान) खुद गढ़ी है। यह उन लोगों के लिए है जो ज़िंदगी के ज़ख्मों को अपनी ताक़त बनाकर हर दिन एक नए आगाज़ की ओर बढ़ते हैं। सुनिए, कैसे एक खामोश रूह दुनिया की भीड़ में भी खुद में खुदा को ढूँढ लाती है।
कभी-कभी हमारा दिल किसी ऐसे कमरे की तरह हो जाता है जहाँ पुरानी यादों और टूटे हुए अरमानों के सिवा कुछ नहीं बचता। यह ग़ज़ल उस उदासी का आईना है, जहाँ वक्त के थपेड़ों ने मकान तो वीरान कर दिए, पर रूह पर उन यादों के निशान अब भी ताज़ा हैं। पन्नों में दबी सूखी मुस्कान और सीने में जलते अरमानों की यह दास्तान उन लोगों के लिए है जो आज भी अपने भीतर एक पूरी कायनात दफन किए खामोश बैठे हैं।
ज़िंदगी महज़ एक सफ़र नहीं, खुद को खोजने की एक प्रक्रिया है। हम अक्सर मंज़िलों की तलाश में निकलते हैं, लेकिन सफर के दौरान जो 'आफ़ताब' (सूरज/ज्ञान) साथ होता है, वही असल पहचान बन जाता है। 'शशि ऐरी' की यह ग़ज़ल उस मोड़ का दस्तावेज़ है जहाँ इंसान हारकर भी जीत जाता है, क्योंकि उसे खुद में ही इबादत का सुकून मिल गया है। एक खामोश सफर का अंत जब 'गुफ़्तगू' और 'मिहराब' (पवित्र स्थान/नूर) की ओर होता है, तो ज़िंदगी की हर बिसात हसीन लगने लगती है।
कभी-कभी कोई शख्स ज़िंदगी में एक ऐसी आहट बनकर आता है कि बरसों के जमा किए हुए दर्द भी पल भर में पिघल जाते हैं। यह ग़ज़ल उस जादुई मुलाक़ात का अक्स है, जहाँ आँखों की मदहोशी और एक खामोश इकरार, दिल के पुराने ज़ख्मों के लिए मरहम बन गया। जब साहिल पर खड़ा इंसान लहरों से उलझना छोड़ दे और खुद ख्वाब बनकर वो हक़ीक़त में आ जाए, तो ज़िंदगी बदल जाती है। एक ऐसा अहसास जिसे लफ़्ज़ों में नहीं, रूह में महसूस किया जाता है।
यह गज़ल उस स्थिति का वर्णन करती है जब शब्द कम पड़ जाते हैं और मौन (खामोशी) संवाद का सबसे सशक्त माध्यम बन जाता है। अक्सर जो बातें ज़ुबान से नहीं कही जा सकतीं, उन्हें आँखें और रूह की खामोशी बयां कर देती है। यह रचना एक ऐसे प्रेमी या मुसाफिर की दास्तान है, जिसने शोर-शराबे वाली दुनिया को छोड़कर अपनी आत्मा की चुप्पी में सुकून और सच्चाई को ढूँढ लिया है।
कभी-कभी दिल के दरवाज़े उन लोगों के लिए खुल जाते हैं जिन्हें हम बरसों से संजोए हुए अपनी यादों की तिजोरी में बंद रखना चाहते थे। एक ऐसी ही बेबसी और रूहानी दस्तक को बयां करती यह ग़ज़ल—जहाँ यादें महमान नहीं, मुसाफ़िर बनकर रूह में बस जाती हैं। शशि ऐरी की कलम से, एक ऐसा अहसास जो बिना किसी आहट के, आपकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़, आपके दिल का हिस्सा बन गया है।
यह ग़ज़ल मानवीय संबंधों की गहराई, यादों और समय के साथ बदलते हुए जीवन के सफर को बड़ी ही भावुकता से दर्शाती है। ग़ज़ल की शुरुआत एक ऐसी 'दुआ' के साथ होती है जो जीवन का आधार बनी हुई है। जैसे-जैसे शेर आगे बढ़ते हैं, यह उन पुरानी मुलाक़ातों की कसक और किसी के ज़िक्र से दिल के रोशन होने का एहसास दिलाती है।
"नफ़रत की लकीरें या इंसानियत का रिश्ता? क्या चुना है आपने? आज की महफ़िल में, एक ग़ज़ल उन सभी के लिए जो अब भी दिल में इंसानियत रखते हैं।"
यह गज़ल उस गहन अहसास को समर्पित है जो रात के सन्नाटे में इंसान को अपने आप से रूबरू कराता है। जब दुनिया सो जाती है, तब यादें और तन्हाई अपना डेरा जमा लेती हैं। इस गज़ल में रात को एक ऐसे आइने की तरह दिखाया गया है, जिसमें मनुष्य अपनी बिखरी हुई ख्वाहिशों और छिपे हुए जख्मों को साफ देख सकता
कठिन से कठिन चट्टानों को चीरकर अपनी मंज़िल पाने और प्यासी धरती को जीवन देने के दरिया के हौसले को बयां करती शशि ऐरी जी की यह प्रेरक नज़्म—"दरिया का ख़्वाब था कि वो सींचे सरज़मीन को"—अड़चनों के आगे कभी न झुकने के जज़्बे को सलाम करती है।
यह ग़ज़ल इस बात का सबूत है कि जो खुद को मिटा हुआ समझते हैं, असल में वही अपनी राख से फिर एक नया आसमान खड़ा करने की ताक़त रखते हैं। हर संघर्षशील और जुझारू दिल को ऊर्जा से भर देने वाली एक शानदार पेशकश।
यह रचना इस सच्चाई को उजागर करती है कि जो बातें ज़ुबान से नहीं कही जा सकें, उन्हें आँखें और ख़ामोशियाँ किस शिद्दत से बयां कर देती हैं। हर संवेदनशील और खामोश दिल की दास्ताँ कहती एक बेहद खूबसूरत पेशकश।
पंजाब की मिट्टी, बचपन की गलियों और गाँव की अनमोल यादों को समर्पित शशि ऐरी जी की यह भावुक कविता—"पिंड दीआं ओ सोहणीआं राहवां बहुत याद आउंदीआं ने"—परदेस में बैठे हर उस दिल की आवाज़ है जो अपनी जड़ों और अपनों को शिद्दत से याद करता है।पिंड दीआं ओ सोहणीआं राहवां बहुत याद आउंदीआं ने,
इस तूफ़ानी और ओजस्वी दृश्य पर आधारित गज़ल,: हवा का हर इक झोंका अब तो, सीधे दिल में उतरता लगता है
राह-भटकों को दिलाता है ये मंज़िल का सुरूर। लाल-ओ-सफ़ेद धारियों में छिपा है कोई पैग़ाम,
हरा-भरा सा यह मंज़र, सुहाना लगता है तेरे क़रीब ये लम्हा, ज़माना लगता है
खामोश सा यह मंज़र, एक ख़्वाब की तरहा है धुंधली सी यह शब, आफ़ताब की तरहा है
यह रचना उस खूबसूरत अहसास को दर्शाती है जहाँ कोई खास शख्स ज़िंदगी के अंधेरों का दिया बनकर हर धड़कन और रूह का ठिकाना बन जाता है। हर संवेदनशील और आशिक़ दिल को झकझोर देने वाली एक बेहद खूबसूरत पेशकश।
यह रचना ज़िंदगी के कैनवास पर रचे-बसे प्रेम के विभिन्न रूपों और हर मुश्किल हालात में अडिग रहने वाले मुसाफ़िर की दास्ताँ है। हर संवेदनशील दिल को प्रेरित करने वाली एक बेहद दिलकश और जीवंत पेशकश।
जफ़ा-ए-ज़माना का ये भी असर है। गिरे सारे पत्ते तो तन्हा हुआ ये,
कि मकड़ी जाले बुनती है मेरे रौशनदानों में। राहत इंदौरी कहते हैं जिसे सूराख़ दीवारों का,
हर एक रिंद अपने ही सुरूर-ओ-होश में मग्न था। छलकते जाम थे साक़ी के हाथों से मोहब्बत के,
ये ज़ख़्मी सरज़मीँ बेबस सी रास्तों पे पड़ी है। जहाँ खिलती थीं कलियाँ, मुस्कुराती थीं बहारें,
मिटा कर एक-दूजे को कहाँ महफ़ूज़ रहेंगे हम? कोई हिंदू, कोई मुस्लिम, कोई सिख है, कोई ईसाई,
इस नज़्म में हमने उस सफ़र को पिरोने की कोशिश की है जहाँ ईश्वर का नूर एक नन्हे शिशु की आँखों में उतरता है, और बपतिस्मा (Baptism) जैसे पवित्र संस्कारों के ज़रिए रूह की गहराई को छूता है। लेकिन क्या आज की इस नफ़रत और सियासत भरी दुनिया में वही रूहानियत कहीं खो गई है? माँ के आँचल में हमने जन्नत का घर पाया।
शीर्षक: तन्हा रात का सफ़र यह गज़ल उस गहन अहसास को समर्पित है जो रात के सन्नाटे में इंसान को अपने आप से रूबरू कराता है। जब दुनिया सो जाती है, तब यादें और तन्हाई अपना डेरा जमा लेती हैं। इस गज़ल में रात को एक ऐसे आइने की तरह दिखाया गया है, जिसमें मनुष्य अपनी बिखरी हुई ख्वाहिशों और छिपे हुए जख्मों को साफ देख सकता
दिलों के दरमियाँ जो है, वो नफ़रत छोड़ भी दो तुम। किसी की आँख में आँसू, किसी के लब पे है सिसकी,
महफ़िल में सब हँसते रहे मेरा हाल देखकर, नमक तो सबके अपनॆ अपने हाथों में था।
हम तो बस चले थे और हम बेक़रार हुए। वो नज़रों से जो तीर चला, दिल के पार हुआ,
ये वो धागा है जिसे कोई भी छोड़ नहीं सकता। हकीकत के तकाजों में उलझना लाज़मी है अब,
मैं तो बस इक पन्ना था, सारा ज़िक्र तुम्हारी पनाहों में था। दुनिया ने तो सिर्फ़ देखा है मेरा हंसता हुआ चेहरा,
मगर नेक इंसान को कब ये पहचान पाते हैं। जहाँ भी हम अपनी शराफ़त दिखा देते हैं,
सोज़ को साज़ में बदलते हैं। बेरुख़ी उनकी जान ले लेगी एक दिन,
लज़्ज़तें रहीं कहाँ इस थकान में अबके। ज़िंदगी की दौड़ में सब कुछ तो पा लिया है,
लज़्ज़तें थीं बहुत हर थकान में मगर, मोहब्बत का वो मुकाम क्या कहिए इक शख्स जो आया ज़िंदगी में, उसका हर अहसान क्या कहिए
.आशियाना वफ़ा का सजा न पाए हम, रूह-ए-इश्क को तो बना न पाए हम।
मोहब्बत जब मुकम्मल इबादत बन जाती है, तो वह अपने साथ एक ऐसा सन्नाटा लाती है जो इंसान को अंदर तक ख़ामोश कर देता है। चारदीवारी के बीच घिरा हुआ घर भी तब एक वीराना लगने लगता है, जहाँ यादों के सिवा कोई हमसफ़र नहीं होता। लेकिन इस तन्हाई से भी बड़ा एक ख़ौफ़ होता है—दुनिया की नज़रों का ख़ौफ़। आशिक़ पूरी दुनिया से लड़ सकता है, मगर वह डरता है कि कहीं उसकी आँखों की नमी या उसके चेहरे की शिकन उसके महबूब के नाम को सरेआम न कर दे। यह ग़ज़ल इसी ख़ामोश तन्हाई और पाकीज़ा मोहब्बत के उसी अनकहे डर की एक बेहद ख़ूबसूरत
क़ीमत तय कर दी गई हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ हर चीज़ बाज़ार बन चुकी है और हर जज़्बात की एक है। जब इंसानियत और पाकीज़गी पर भी तिजारत (व्यापार) का साया मंडराने लगे, तो एक शायर का दिल तड़प उठता है। यह ग़ज़ल समाज के इसी गहरे दर्द, गिरते हुए मूल्यों और टूटती हुई अस्मत की एक बेहद संजीदा और बेबाक़ दास्तान है।
मोहब्बत नाम है मुकम्मल शिद्दत और अटूट विश्वास का। लेकिन जब इस राह में दूरियाँ और ख़ामोशियाँ क़दम चूमने लगें, तो दिल का सबसे बड़ा सहारा 'सब्र' बन जाता है। एक ऐसा सब्र, जो वक़्त के इम्तिहान से डरता नहीं, बल्कि हर गुज़रते लम्हे के साथ और गहरा होता जाता है।शायर 'शशि' की यह ग़ज़ल इसी ख़ामोश मोहब्बत, पाकीज़ा इंतज़ार और बेइंतहा सब्र की दास्तान है। जहाँ उम्मीद का दामन छूटा नहीं और दिल ने हर चोट पर सिर्फ़ मुस्कुराकर यही कहा... 'सब्र हर बार किया'। पेश-ए-ख़िदमत है यह रोमानी और जज़्बाती ग़ज़ल..." मोहब्बत मे
दस्तूर ख़ामोशियों का भी क्या कहिए, बिन कहे वो सब कुछ सुन लेते हैं
हर सिम्त ही छाया हुआ सरूर का समाँ है, साक़ी ने जो बख़्शी है वो मय यहाँ रवाँ है।
अक्सर महफ़िलों में शोर बहुत होता है, लेकिन सबसे गहरी बातें वे होती हैं जो कही नहीं जातीं। कुछ जज़्बात लफ़्ज़ों के मोहताज नहीं होते; वे दिल की उस खामोश गलियारे से उपजते हैं, जहाँ ज़ुबान का पहुँचना मुमकिन नहीं होता। हमारी आँखें सिर्फ देखने का ज़रिया नहीं, बल्कि रूह का आईना होती हैं—ये वो खिड़कियाँ हैं जिनसे दिल अपनी पूरी दास्ताँ बयां कर देता है। यह ग़ज़ल इसी 'खामोश गुफ्तगू' का एक दस्तावेज़ है
ख़ूने-दिल देते रहे वक़्त के चराग़ों को, फिर भी हम रास न आए इन शब-ए-दाग़ों को।
रास्ते भूल गए राही को, इश्क़ भुला न सकीं वो गलियाँ। हम तो मुसाफ़िर बनके जिए, पर दिल से जा न सकीं वो गलियाँ।
टूटे आईने से भला क्या शिकवा करना, अक्स अपना ही हज़ार टुकड़ों में था।
फ़न-ए-दिलनवाज़ी का था, शोर धड़कनों का था, शहर की फ़ज़ाओं में, चर्चा उसकी ज़ुल्फ़ों का था।
ऐ मेज़बां न कर मेहमानों का ख़ून दहलीज़ पे न कर अरमानों का ख़ून
खुद अपनी हसरतों को खाक में मिला के मैं तो पी रहा हूँ आँसू मिला-मिला के
मिलाने को बहुत कुछ था मौजूद, मगर अश्क मैंने चुने, दुनिया के सौ हसीं ख़्वाब थे मगर अश्क मैंने चुने।
मिज़ाज उनका क्या कहिये, उनको छूने से भी डर लगता है, वो इक नाज़ुक सा सपना है, जिसके टूटने से भी डर लगता है।
ज़ुबाँ से लफ़्ज़ क्या निकले, टपक गए आँसू, कि जैसे ज़ब्त के बांध, चटक कर बह गए आँसू।
धड़कनों में घर बनाया, तुझ से बिना पूछे, हमने किया है गुनाह, तेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़।
घटा का ओढ़ के आँचल वो मुस्कुराता है, ख़ुदा का नूर ज़मीं पर उतर आता है।
चाहा था बनूँ मील का पत्थर, तुमने तो आशिक़ बना दिया, मंज़िल का पता देने वाले को, ख़ुद ही मुसाफ़िर बना दिया।
वो जो चले आए ख़्वाब में, इक नूर सा छा गया, जैसे बुझे हुए चिराग़ को, कोई फिर से जला गया।
नींद आँखों से चुरा ले जाती हो तुम, क्यों ख़्वाबों में चली आती हो तुम।
मेरे सूखे हुए उपवन को वो महका आये, वो जो घबरा के बाहों में चले आये।
हवा के रुख़ को मोड़ने का अरमान छोड़ जाऊँगा, मैं वो पत्थर हूँ घिस के निशान छोड़ जाऊँगा।
अश्क अब कहाँ तक बयां करेंगे दास्तां-ए-ज़िंदगी, हर कदम पर जब दस्तूर-ए-फ़रेब मौजूद है।
अजीब रंग में गुज़रा वो दौर-ए-मुलाक़ात, हुस्न पुर-ज़ोर था, नज़ाकत-ए-इश्क़ भी थी मौजूद।
कलेजा चीर देती है ये शाम-ए-फ़िराक़, ज़हर सी रूह में बहती है ये शाम-ए-फ़िराक़।
न वो पहली सी बातें हैं, न वो पहली सी शामें हैं, बिछड़ कर खुद से बैठे हैं, अजीब सी ये राहें हैं।
दिलों में अब वो पहले सी कहाँ वफ़ा बची है, ज़माने भर में बस मतलबी सी इक हवा बची है।
अंधेरों को उजाले की यहाँ सौग़ात कहते हैं, जो कातिल हैं वही अब वक़्त के हालात कहते हैं।
लपेटे जिस्म से अपने वो काली रात लाए हैं, ज़ुबाँ पर झूठ और हाथों में सौ आफ़ात लाए हैं। मुश्किलें
ग़ज़ल: रात बीतने तक सुलगती रही यादें और ये शम्मा जली, रात बीतने तक,
ग़ज़ल: बीती रात तक तेरे ख़्वाबों की महफ़िल में शम्मा जली, बीती रात तक,
दर्द-ए-इश्क हिज्र की आग में जलना भी एक मंज़िल है, b
मैं थक गया हूँ ढोते हुए ये बोझ ग़मों का, कभी तो ख़त्म होगा ये सिलसिला इलज़ामों का।
वो जिसकी आंच में जल कर बदन को राख होना था उसी शोले को सीने में लिए अब तक जी रहे हैं हम
दिखाते हैं जो चेहरे अब, वो हैं ज़ुल्म-ओ-सितम के, असर जो डाल जाते हैं, बदलते रंग मौसम के।
हुस्न-ए-जानाँ क्या गज़ब की चमक हुस्न-ए-जानाँ में है,
टूटे हुए काँच और अक्स टूटे हुए काँच में अब भी अपना अक्स नज़र आता है,
आज फिर लफ़्ज़ मेरे कम पड़ने लगे, दिल की धड़कन के साज़ उखड़ने लगे।
देखे ख़्वाब ता-उम्र तेरे अक्स के, सूरतें बना न पाया मैं। यादों की धूल में खोया रहा उम्र भर, हक़ीक़त और फ़साने का फ़र्क़ मिटा न पाया मैं।
बन के तूफ़ान-ए-हवा जो तुमने खटखटाया दर मेरा, उड़ गया तिनकों की तरह, दर-ओ दीवार मेरा।
वो लम्हे जो बिताए थे हमने साथ कभी, आज भी मेरी साँसों में उसी की महक है।
ज़िंदगी के हर इक पहलू पे ताला लगाता चला गया, ग़म को अपने दिल के सीने में छुपाता चला गया।
तेरी उम्मीद ही बनी मेरे ग़म की वजह, तेरी ख्वाहिश ही है जीने की वजह
तेरे हुस्न-ए-अख़लाक़ को देख, ठहर जाने को जी चाहता है, तेरी आँखों में उतर कर, सँवर जाने को जी चाहता है।
यह सुर्ख लब और ये नज़रों की शोख़ियाँ, ये हुस्न और निगाह की मदहोशियाँ।
गर रूह-ए-मज़हब से दिलों का दर मुकीम होता, ऑज हर इन्सान खुर्शीद(Radiant Sun) हर दिल लतीफ़ (kind)होता
मंज़र-ए-तनहाई सफेद मंज़र, ये हसीं वादी, ये बर्फीली तनहाई
हद-ए-इश्क से आगे इश्क की हद से निकलते तो ये मंज़र देखते,
तू तूफ़ानों से मुझे रोक, ये मुमकिन नहीं साक़ी, मैं बहती हुई धारा हूँ, मुझे रुकना नहीं आता।
कितने ही दाग़ हमने अपने ज़मीर पे लगा लिए, सिर्फ़ दुनिया की नज़र में, खुद को बेदाग बनाने की खातिर।
आख़िरी इंतज़ार अभी न दफ़नाओ यारों, मेरे इन ख़्वाबों को,
आँसुओं का पलक से यूँ गिर जाना, जैसे पुराने ज़ख्मों का फिर हरा हो जाना।
तेरे हुस्न-ए-अख़लाक़ पे मरने को जी चाहता है, फिर तेरी आँखों में सँवरने को जी चाहता है।
तेरी उम्मीद ही थी मेरे ग़म की वजह, तेरी ख़्वाहिश ही है अब जीने की वजह।
ये सुर्ख़ लब और नज़र की शोखियाँ, ये हुस्न और निगाह की मदहोशियाँ।
नज़रों से जब उनकी नज़रें मिलने लगीं, खामोश धड़कनें भी आहें भरने लगीं।
वो चार कंधे जो अंत में हमें इज़्ज़त दें, समझना वही तो इस जीवन की कमाई है।
आज फिर खामोश चीख ने जगाया सपनों से, आज फिर हर एक ज़ख़्म गहरा रिसने लगा।
गर बदल गया मैं, तो इसे वक़्त न समझना, मैं वो पत्थर हूँ जो घिस कर भी निशान छोड़ जाएगा।
मेरे वजूद ने की फिर शिकायत, मेरी शख्सियत से, कि ज़िन्दा है अगर तू, तो फिर जीता क्यों नहीं?
हर ग़म को अपने सीने में, छुपाता चला गया, न मालूम था किस ओर, ये ज़िंदगी ले जाएगी।
इंसान हो तुम नफ़रत की दीवारें न उठाया करो, मज़हब के बहाने अपनों को न ठुकराया करो।
ज़माने में हम भी गिरफ़्तार तेरे इश्क़ में थे, , ज़माने में हम भी गिरफ़्तार तेरे इश्क़ में थे,
रात जवाँ है और साक़ी है हसीं, फिर क्यों है दिल उदास, क्यों दर्द-आफ़रीं?
कोई फरियाद दिल में दबी थी, एक खलिश सी मगर हर घड़ी थी,
शिकवों के शहर में, मुस्कुराने का बहाना ढूँढता हूँ, सुकून मिल जाए जहाँ, वो अपना ठिकाना ढूँढता हूँ।
बड़ी मुद्दत से ठहरी है, ये धड़कन मेरी राहों में, बड़ी हसरत से देखी हैं, वो यादें तेरी आँखों में।
न होश है अपना, न खबर है ज़माने की, एक रस्म सी बन गई है, बस तेरे पास आने की।
वो ख़ुद में जो मुकम्मल है उसकी निशानी हूँ, मैं इश्क़ की, इबादत की, एक रवानी हूँ।
यक़ीन है मुझको, ये ख़्वाब हकीक़त बनेगा कभी, तेरे बिना ये दिल अधूरा, ये रात अधूरी कहीं।
दूर क्षितिज पे जब चाँद मुस्कुराए, तेरी यादों का सावन फिर बरस जाए।
तेरे बिना भी तुझसे मोहब्बत हो गई, आँखों को इंतज़ार की आदत हो गई।
सदियों पुरानी कोई बात है। जैसे किस्मत की सौगात है।
दिल को हर लम्हा बस तेरी चाहत हो गई, आँखों को अब इंतज़ार की आदत हो गई।
यक़ीन है कि ये ख़्वाब सच में बदलेगा कभी, हसीं सा वो एक लम्हा, फिर से आएगा कभी।
जाम लब तक भी आया तो क्या पाया? इश्क़ दिल में न समाया तो क्या पाया?
नाज़-ए-हुस्न से पर्दा जो हटाया हमने, ख़ुद को जलते हुआ, शम्मा सा पाया हमने।
हम तेरे इश्क़ में पागल हो गए देख कर तुझको सनम, हम बस तेरे हो गए।
तेरे बिना अब तो हर इक पल, अधूरी है खुशी मेरी, साँसें भी थक कर पूछती हैं, कहाँ है ज़िंदगी मेरी।
इश्क़ के गहरे रंग में ऐसे डूब गया है दिल, ख़ुद से ही शर्मिंदा होकर चुपके से रोया है दिल।
दिल के ये ज़ख़्म अब छुपाऊँ कैसे, सियाह रात में ख़ुद को बचाऊँ कैसे।
चाँद ने बयां की दास्तां रात की, तेरे बिस्तर की हर शिकन की तरह।
एक पत्थर जो उछाला हमने, ज़माना बाग़ी हो गया, तुम्हारी आँखों में जो देखा मंज़र, वो मंज़र, बाग़ी हो गया
कितने ही दाग़ हमने ज़मीर पे सजा लिए, ख़ुद को ही बेदाग़ बनाने की ख़ातिर।
सोचा था छू लेंगे बुलंदियाँ, ख़्वाबों को सजाने के लिए, क़त्ल हुए वो ख़्वाब यहाँ पर, रुसवाइयाँ बढ़ाने के लिए।
दाग़-ए-ज़िंदगी बचपन से माना था कि बेदाग़ जीना है ज़िंदगी,
न हम ही अब रहे दुनिया में कुछ जीने के क़ाबिल, न दिल ही अब रहा अपना यहाँ प्यार के क़ाबिल।
दाग़दार किया दामन, उन हाफ़िज़ों ने मेरा, बनाया था रहनुमा, जिन्हें अपनी ज़िंदगी का।
तमन्नाओं को दिल में दबा के जिए हम, ग़म अश्कों में मिला के पिए हम।
क्यों बन के मदिरा का प्याला उम्मीद जगा जाती हो, इन उदास सी साँसों में क्यों महक बसा जाती हो?
न ज़िंदगी का डर हमको, न मौत का ख़ौफ़ छाए, हम जुर्म तो करते हैं, पर दिल में न डर समाए।
जो यादें हमने बंद कर रखी थीं, वो बिन बुलाए दिल में उतर आती हैं।
जो बात लफ़्ज़ों में न कही जा सके, वो ख़ामोशी में ख़ुद-ब-ख़ुद कह दी जाती है।
राख में भी एक रोशनी छुपी होती है — जो गिरता है, वही फिर उठता है।
जो दरिया सब कुछ देकर बह जाता है, उसी की कहानी किनारों पर ज़िंदा रहती है।
शमा जलती रही, रात गुज़रती रही — पर जिसका इंतेज़ार था, वो न आया।
तन्हाई बुरी नहीं — वही वो आईना है जिसमें इंसान ख़ुद से मिलता है।
क़लम उठाओ — दिल में जो दबा है बरसों से, उसे लफ़्ज़ों में ढालने का वक़्त आ गया।