ग़ज़ल1 January 2026

लफ़्ज़ों का मौसम

शब्दों के मौसम पर एक ग़ज़ल

फिर आया है लफ़्ज़ों का मौसम, क़लम उठाओ तो,

दिल में जो दबा है अरसे से, वो बात सुनाओ तो।

बहार आई है शायरी की, महफ़िल सजने लगी,

जो ख़्वाब अधूरे रह गए थे, उन्हें पूरा पाओ तो।

लफ़्ज़ों में वो ताक़त होती है जो दिल को छू जाए,

एक बार क़लम को आज़ाद करो, कुछ लिख के दिखाओ तो।

ख़ामोशी भी एक ज़बान है, पर लफ़्ज़ों की बात और है,

जो कह न सके ज़माने को, वो 'शशि' को बताओ तो।

मौसम बदलते रहते हैं, पर शायरी सदा रहती है,

'शशि' कहता है — लफ़्ज़ों का मौसम, एक बार फिर लाओ तो।

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