ग़ज़ल1 June 2026
तन्हा रात का सफ़र
A ghazal on solitude and the night
उतरती रात जब आँगन में दस्तक देने आती है,
ये तन्हाई ही अक्सर मुझको खुद से मिलवाती है।
सितारे भी यहाँ पर अब न जाने क्यों खफ़ा से हैं,
दबे पाँव ही ये ठंडी हवा आकर रुलाती है।
अंधेरा और भी गहरा हुआ है याद के पल में,
कोई परछाईं-सी मेरे साथ-साथ चलती जाती है।
न चाँद है, न रोशनी, न कोई हमसफ़र मेरा,
मगर ये रात भी अपनी कहानी सुनाती है।
शाशी, ये तन्हा रात का सफ़र भी ख़त्म होगा,
सुबह की किरण जो आती है, वो राह दिखाती है।
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