ग़ज़ल1 February 2026

शब-ए-इंतेज़ार

इंतेज़ार की रात पर एक ग़ज़ल

रात भर जलती रही शमा, शब-ए-इंतेज़ार में,

कोई आया न मगर, गुज़री वो हर बार में।

दरवाज़े की आहट पर चौंक उठता हूँ अभी,

तेरी याद बस गई है मेरे हर विचार में।

चाँद भी थक के झुका, तारे भी सो गए,

मैं अकेला जागता हूँ इस अँधेरी रात में।

खत लिखे, मिटाए, फिर लिखे, फिर रो दिया,

तेरा नाम ही रहा बस मेरे हर ख़याल में।

वो न आए, पर उम्मीद का दामन थामे हूँ,

'शशि' डूबा है अभी भी शब-ए-इंतेज़ार में।

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