कविताMarch 2026

घर की खुशबू

यादों और अपनापन महसूस कराने वाली एक कविता

वो घर की खुशबू में घी का तड़का, वो सोंधी-सोंधी महक फूलों की

ऐ 'शशि' अब इन यादों को मैं, भला कहाँ से लाऊँ, बताओ तो?

वो माँ की ममता की छाँव ठंडी, वो बाबुल की चौखट का वो साया

बिखर गई है अब उम्र सारी, वो अपनापन कहाँ से लाऊँ, बताओ तो?

वो बचपन के खेल और आँगन, वो बारिश में कागज़ की नाव अपनी

गुज़र गया वो दौर सुनहरी, वो बचपन कहाँ से लाऊँ, बताओ तो?

पुराने उन खतों की स्याही में, लिपटी हुई थी जो मीठी बातें

जला दिए जो वक़्त ने लम्हे, वो अरमान कहाँ से लाऊँ, बताओ तो?

किताबों में रखे सूखे गुलाबों सा, महकती है आज भी पुरानी यादें

मगर हकीकत की इस भीड़ में, वो सावन कहाँ से लाऊँ, बताओ तो?

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