ग़ज़ल1 June 2026
दरिया का ख्वाब
दरिया का ख्वाब था कि सींचे सरज़मीं को,
दरिया का ख्वाब था कि सींचे सरज़मीं को,
वो प्यास बुझाने चला था, छोड़कर मकीं को।
बहाव की जद्दोजहद में पत्थर भी पिघल गए,
वो रास्ता बनाता रहा, उस सख़्त ज़मीं को।
पहुँचा जो साहिल पे तो ख़ुद से ही मिला वो,
खो दिया उसने ख़ुद को, पाने के लिए नमीं को।
बस्तियाँ बसीं किनारे, उसके ही वजूद से,
नज़राना दिया उसने, अपनी ही रूह-ए-हसीं को।
सूख गया जो कभी, तो यादें ही लहर बनीं,
तड़प के उसने फिर से पुकारा है जमीं को।
जो गुज़र गया दरिया, वो कहानी छोड़ गया,
'शशि' लिखता है अब, प्यासी उस रमीं को।
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