ग़ज़ल1 May 2026
राख और रोशनी
An elegy for what endures
चिंगारियों का हजूम छुपा था राख के ढेर में,
मुद्दत से एक आग दबी थी राख के ढेर में।
वो बुझ गया था जो ज़माना, यादें जलती रहीं,
अभी भी थोड़ी तपिश बची थी राख के ढेर में।
हवा चली तो कोई राज़ शायद फिर से खुल जाए,
वो ख़्वाब सारे लिखे हुए थे राख के ढेर में।
अँधेरी रात में उम्मीद की इक किरण जागी,
वो रोशनी भी कहीं मिली थी राख के ढेर में।
तमाशा देखा ज़माने ने जलने का मेरे मगर,
जहान सारा ही तो बना था राख के ढेर में।
गिरा था जब मैं तो सबने समझा कि राख हूँ मैं,
मगर छुपी एक जान सजी थी राख के ढेर में।
'शशि' कहे है जो राख होकर भी मुक़म्मल है,
उसी की रूह फिर से उठी थी राख के ढेर में।
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