ग़ज़ल1 May 2026
राख और रोशनी
An elegy for what endures
चिंगारियों का हजूम छुपा था राख के ढेर में,
मुद्दत से एक आग दबी थी राख के ढेर में।
वो बुझ गया था जो ज़माना, यादें जलती रहीं,
अभी भी थोड़ी तपिश बची थी राख के ढेर में।
हवा चली तो कोई राज़ शायद फिर से खुल जाए,
न जाने क्या-क्या दफ़न था राख के ढेर में।
जो रोशनी थी कभी, वो राख बन के रह गई,
मगर उजाले की उम्मीद थी राख के ढेर में।
शाशी, जो जल के बुझ गया, वो भी कुछ कह गया,
एक पूरी दास्तान थी राख के ढेर में।
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