Nazams — verse that flows like a river, unhurried and deep.
मोहब्बत अक्सर उन रास्तों पर चलती है जहाँ लफ़्ज़ कम पड़ जाते हैं। यह ग़ज़ल उस 'अजीब दूरी' को बयां करती है, जहाँ दो रूहें पास होकर भी अजनबी सी महसूस होती हैं। जब आँखें ज़मीं कुरेदती हैं और धड़कनें शोर मचाती हैं, तब 'दस्तूर-ए-ख़ामोशी' ही एकमात्र संवाद बन जाता है। यह उन लोगों के लिए है जिन्होंने बिना कहे सब सुन लिया और बिना सुने सब समझ लिया—एक ऐसी कशिश, जहाँ नाम लिए बिना भी सब पुकार लिया जाता है।
जहाँ अच्छाई को कमजोरी और साफ़दिली को गुनाह माना जाने लगे, वहाँ इंसान का वजूद क्या? यह ग़ज़ल समाज के उस दोहरे चेहरे को बेनकाब करती है, जहाँ मतलब निकलने तक 'फ़रिश्ते' कहे जाते हैं और काम निकलते ही नज़रें चुरा ली जाती हैं। काँच और पत्थर को एक तराजू में तोलने वाले इस दौर में, शराफ़त का रास्ता कितना कठिन है, इसी का आईना है यह नज़्म।
इस नज़्म में हमने उस सफ़र को पिरोने की कोशिश की है जहाँ ईश्वर का नूर एक नन्हे शिशु की आँखों में उतरता है, और बपतिस्मा (Baptism) जैसे पवित्र संस्कारों के ज़रिए रूह की गहराई को छूता है। लेकिन आज की इस नफ़रत और सियासत भरी दुनिया में वही रूहानियत कहीं खो गई है?