Ghazal1 July 2026

मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़: यादों की दस्तक

कभी-कभी दिल के दरवाज़े उन लोगों के लिए खुल जाते हैं जिन्हें हम बरसों से संजोए हुए अपनी यादों की तिजोरी में बंद रखना चाहते थे।

मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ तू आया है दिल में,

बरसों से बंद था जो दर, खुल गया है दिल में।

यादों की तिजोरी में रखा था तुझे मैंने,

पर तू मुसाफ़िर बनकर आ बसा है दिल में।

दस्तक दी न आहट की, बस रूह में उतर गया,

बिन बुलाए मेहमान-सा समा गया है दिल में।

चाहा था कि भूल जाऊँ, पर भूल न सका,

तेरी याद का दीया जल रहा है दिल में।

'शशि' कहता है — जो मर्ज़ी के ख़िलाफ़ आए,

वही सबसे गहरा निशान छोड़ता है दिल में।

Poet's note

एक ऐसी बेबसी और रूहानी दस्तक को बयां करती यह ग़ज़ल — जहाँ यादें महमान नहीं, मुसाफ़िर बनकर रूह में बस जाती हैं।

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