Shashi Airi — poet

Shayar · शायर

Shashi Airi

शशि ऐरी

Contemporary · India

Poet writing in Hindi, Urdu, and English. His verse moves between longing and memory, between the classical ghazal tradition and the modern lyric.

Signature Sher

یادوں کے حاشیے سے / آرزو کے مرکز تک

स्मृति के हाशिये से / लालसा के केंद्र तक

From the margins of memory / to the center of longing

Biography

The Poetकवि का परिचय

Shashi writes from the margins of memory and the center of longing — in Urdu, Hindi, and English, across the borders language draws and dissolves. His poetry is an act of listening: to the silences between words, to the weight of what is left unsaid.

The Mehfil — a gathering, a salon, a space where voices meet — is his metaphor for what poetry does: it calls people together across time, across distance, across the untranslatable.

Rooted in the classical ghazal tradition yet alive to the contemporary moment, Shashi's work carries the fragrance of Ghalib and Faiz while speaking in a voice unmistakably his own — tender, precise, and suffused with a longing that refuses easy resolution.

Influences

Mirza GhalibFaiz Ahmed FaizGulzarMir Taqi Mir

Shayari · शायरी

166 Poems

Ghazals, Nazams, Kavitayan — the complete collection

ग़ज़ल

बरसों सुलगती आग को

मोहब्बत में मिलने वाले ज़ख्मों को खामोशी से सीने में दबाए रखना और दुनिया के सामने हर दर्द को मुस्कान के पर्दे के पीछे छुपा लेना—यही किसी सच्चे आशिक़ की सबसे बड़ी दास्ताँ होती है। तन्हाइयों के अंधेरे में उम्मीद का एक दिया जलाए रखने और अपनों के दिए हर धोखे के बावजूद हर रिश्ते को बचाने की जद्दोजहद बयां करती है,

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ग़ज़ल

मुमकिन नहीं तूफ़ानों का मुट्ठी में समा जाना,

"कहते हैं कि सबसे गहरे दर्द वो होते हैं जो होंठों तक नहीं आते, बस सीने के भीतर किसी सुलगते हुए अंगारे की तरह सुलगते रहते हैं। दुनिया को इंसान का सिर्फ मुस्कुराता हुआ चेहरा दिखाई देता है, लेकिन उस हँसी के पीछे क्या-क्या बवंडर छिपे हैं, इसकी ख़बर हर किसी को नहीं होती। खामोशी के इसी समंदर और भीतर सुलगते सैलाब को बयां करती,

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ग़ज़ल

मन्नतें माँग कर पाया था जिन्हें,

"रिश्तों की दुनिया में कुछ दर्द ऐसे होते हैं जो आवाज़ नहीं करते, बस भीतर ही भीतर इंसान को तोड़कर रख देते हैं। जब कोई अपना, जिसे आपने अपनी दुआओं और मन्नतों से तराशा हो, अचानक बेगाना हो जाए और बेरुखी की हर हद पार कर दे—तब ज़ुबान पर शब्द नहीं, बस सिसकियाँ रह जाती हैं। अपनों के इसी वीरान कर देने वाले रवैये और गहरे जख्मों को बयां करती, मेरी यह नई ग़ज़ल..."

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ग़ज़ल

दुआ रब से कि हर इक ख़ुशी

यह रचना स्नेह, आशीर्वाद और पवित्र दुआओं का एक ऐसा गुलदस्ता है, जिसमें अपनों की खुशी और उनकी लंबी उम्र के लिए दिल की गहराइयों से कामना की गई है। इस कविता का हर एक शेर ज़िंदगी में बहार, खुशियों की नेमतों और हर कदम पर कामयाबी की दुआ मांगता है। 'उठाऊँ जब भी दुआ के लिए मैं हाथ शशि, खुदा से आपकी हर एक खुशी का पैगाम आए' पंक्तियाँ किसी अपने के प्रति अगाध प्रेम और सच्ची प्रार्थना का सबसे सुंदर प्रतीक हैं।

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ग़ज़ल

कदर रिश्तों की थी

यह ग़ज़ल रिश्तों की कद्र, नज़रअंदाज़ किए जाने की टीस और अकेलेपन की गहराई को बहुत सादगी और असरदार अंदाज़ में पिरोती है। जब अपनों की बेरुख़ी से दिल टूटता है, तो इंसान दूसरों से आस छोड़कर अपने ही दर्द का हमराज़ बन जाता है। दुनिया की सच्चाई और दिखावे पर तीखा तंज कसती यह ग़ज़ल अंत में यह संदेश देती है कि कैसे दिल के गहरे ज़ख़्म ही गीतों, साज़ों और शायरी की शक्ल अख्तियार कर लेते हैं।

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ग़ज़ल

थक गया हूँ हर क़दम

यह ग़ज़ल ज़िंदगी की धूप में जलते-जलते थक चुके एक मुसाफ़िर की दास्तान है। इसमें उस बेबसी और गहरे दर्द को बयां किया गया है जहाँ हर कदम एक बोझ बन जाता है, उम्मीद के दीये बुझ जाते हैं और इंसान मौत को भी एक सुकून भरी राहत की तरह देखने लगता है। 'उम्र सारी बीत गई जलते-जलते' पंक्ति पूरी ज़िंदगी के संघर्ष और अधूरे सपनों का एक शाश्वत सार है।

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ग़ज़ल

"फ़ना होने की तैयारी: सफ़र ही मंज़िल है"

जब मोहब्बत रूह में इस तरह बस जाए कि धड़कनों के शोर का इज़हार भी बेमानी लगने लगे, तब ज़िंदगी के विस्तार की ज़रूरत नहीं रहती। यह ग़ज़ल उस मुकाम की दास्तान है जहाँ मंज़िलों की फिक्र नहीं, बल्कि सफ़र की खूबसूरती में खो जाने का फ़ैसला है। 'फ़ना' (मिट जाने) की तैयारी और हर ज़ख्म को चुपचाप ओढ़ लेने का यह अंदाज़, उन लोगों के लिए है जिन्होंने प्रेम में खुद को पूरी तरह मिटा दिया है।

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ग़ज़ल

मरहम-ए-दिल: एक हसीन मुलाक़ात

कभी-कभी ज़िंदगी के सफ़र में कोई इंसान एक ऐसे मोड़ पर मिलता है, जहाँ से सारे दर्द धुंधले पड़ जाते हैं। यह ग़ज़ल उसी जादुई मुलाक़ात का अक्स है, जहाँ आँखों की मदहोशी और एक खामोश इकरार, दिल के पुराने ज़ख्मों के लिए मरहम बन गया। जब आप साहिल पर खड़े होकर लहरों से उलझ रहे हों, और कोई ख़्वाब बनकर आपके पास आ जाए—तो फिर शिकायतों का गुंजाइश ही कहाँ बचती है? यह ग़ज़ल प्यार की उस मासूमियत और इत्मीनान की दास्तान है, जहाँ 'दर्द' और 'सुकून' के बीच का फासला मिट जाता है।

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ग़ज़ल

"दस्तूर-ए-दुनिया: शराफ़त का सिला

जहाँ अच्छाई को कमजोरी और साफ़दिली को गुनाह माना जाने लगे, वहाँ इंसान का वजूद क्या? यह ग़ज़ल समाज के उस दोहरे चेहरे को बेनकाब करती है, जहाँ मतलब निकलने तक 'फ़रिश्ते' कहे जाते हैं और काम निकलते ही नज़रें चुरा ली जाती हैं। काँच और पत्थर को एक तराजू में तोलने वाले इस दौर में, शराफ़त का रास्ता कितना कठिन है, इसी का आईना है यह नज़्म।

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ग़ज़ल

"पनाहों का ज़िक्र: आहों की दास्तान"

कुछ बातें लफ़्ज़ों में कभी नहीं ढलतीं, वे बस आहों और सन्नाटों में सिमट कर रह जाती हैं। यह ग़ज़ल उस अदृश्य संघर्ष को उजागर करती है, जहाँ दुनिया केवल एक हंसता हुआ चेहरा देखती है, जबकि निगाहों में बिखरा हुआ सन्नाटा कैद रहता है। जब इश्क़ किसी और की दुआओं में बस जाए और वफ़ा की कश्ती लहरों के ख़ौफ़ में खो जाए, तो सिर्फ़ एक ही रास्ता बचता है—ज़माने की नफ़रत के बीच मोहब्बत का चिराग जलाना। यह ग़ज़ल एक ऐसे ही टूटकर फिर से संवरने वाले मुसाफ़िर की कहानी है।

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ग़ज़ल

"लहू से लिखे लफ़्ज़: इश्क का अटूट धागा"

इश्क महज़ एक जज़्बात नहीं, बल्कि एक ऐसा धागा है जिसे चाहकर भी तोड़ा नहीं जा सकता। यह ग़ज़ल उस शायर की आवाज़ है जो हक़ीक़त की उलझनों के बावजूद अपने जज़्बातों के दरिया को बहने से नहीं रोक सकता। जब लफ़्ज़ लहू से लिखे जाएं, तो वक्त का पहिया भी उन्हें मिटा नहीं सकता। यह नज़्म उस दृढ़ निश्चय का प्रतीक है कि एक बार जो इंसान कागज़ पर उतर आए, तो फिर खुद को पीछे मोड़ने की गुंजाइश बाकी नहीं रहती।

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कविता

ख़ामोश गुफ़्तगू

मोहब्बत अक्सर उन रास्तों पर चलती है जहाँ लफ़्ज़ कम पड़ जाते हैं। यह ग़ज़ल उस 'अजीब दूरी' को बयां करती है, जहाँ दो रूहें पास होकर भी अजनबी सी महसूस होती हैं। जब आँखें ज़मीं कुरेदती हैं और धड़कनें शोर मचाती हैं, तब 'दस्तूर-ए-ख़ामोशी' ही एकमात्र संवाद बन जाता है। यह उन लोगों के लिए है जिन्होंने बिना कहे सब सुन लिया और बिना सुने सब समझ लिया—एक ऐसी कशिश, जहाँ नाम लिए बिना भी सब पुकार लिया जाता है।

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कविता

मोहब्बत का मुकाम

कभी-कभी कोई इंसान ज़िंदगी में ऐसे आता है कि वह सिर्फ एक शख्स नहीं, बल्कि इबादत बन जाता है। यह ग़ज़ल उस रूहानी सुकून का नाम है, जो किसी के होने भर से ज़िंदगी के हर मोड़ को हसीन बना देता है। जब अँधेरों से डर खत्म हो जाए और कोई शख्स रग-रग में दवा बनकर उतर जाए, तो वही 'मसीहा-ए-अरमान' कहलाता है। एक ऐसी मोहब्बत जिसे लफ़्ज़ों में बयां करना नामुमकिन है, बस महसूस किया जा सकता है।

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ग़ज़ल

"रस्मों की मोहब्बत और बिखरे मिज़ाज"

"ख्वाबों में भी गुनहगार..." — किसी का ऐसा नज़रिया, जहाँ आपकी मोहब्बत उनके लिए महज एक गुनाह हो। यह नज़्म उन दोहरे मिज़ाजों को बेनकाब करती है जो पल में शराफ़त ओढ़ते हैं और पल में बगावत पर उतर आते हैं। यदि आपने भी कभी किसी ऐसे रिश्ते को झेला है जहाँ वफ़ा सिर्फ एक रस्म बन गई हो, तो यह ग़ज़ल आपकी खामोशी को आवाज़ देगी।

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ग़ज़ल

"सीने में दफ़न: बोझ और बेबसी"

कुछ राज़ इतने भारी होते हैं कि उनके बोझ से सांसें भी घुटने लगती हैं यह ग़ज़ल उन दबी हुई हसरतों और खामोश चीखों की कहानी है, जो हक़ीक़त की ऊंची दीवारों के पीछे कैद हैं। जब दुआएं थक जाएं और ज़मीं पैरों के नीचे से खिसकने लगे, तब इंसान खुद से ही छुपने लगता है। एक ऐसी बेबसी जिसे शब्दों में पिरोना, खुद को थोड़ा हल्का करने की कोशिश जैसा है।

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कविता

"दस्तूर-ए-दुनिया: शराफ़त का सिला"

जहाँ अच्छाई को कमजोरी और साफ़दिली को गुनाह माना जाने लगे, वहाँ इंसान का वजूद क्या? यह ग़ज़ल समाज के उस दोहरे चेहरे को बेनकाब करती है, जहाँ मतलब निकलने तक 'फ़रिश्ते' कहे जाते हैं और काम निकलते ही नज़रें चुरा ली जाती हैं। काँच और पत्थर को एक तराजू में तोलने वाले इस दौर में, शराफ़त का रास्ता कितना कठिन है, इसी का आईना है यह नज़्म।

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ग़ज़ल

"ज़र्रे-ज़र्रे में खुदा: दर्द से आगाज़ का सफ़र"

दर्द को 'दाद' और सोज़ को 'साज़' में बदल देने का हुनर हर किसी के पास नहीं होता। यह ग़ज़ल एक ऐसे मुसाफ़िर की कहानी है, जिसने भीड़ में अकेले चलकर अपनी 'परवाज़' (उड़ान) खुद गढ़ी है। यह उन लोगों के लिए है जो ज़िंदगी के ज़ख्मों को अपनी ताक़त बनाकर हर दिन एक नए आगाज़ की ओर बढ़ते हैं। सुनिए, कैसे एक खामोश रूह दुनिया की भीड़ में भी खुद में खुदा को ढूँढ लाती है।

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ग़ज़ल

"हुजरा-ए-याद: रूह के दफन अरमान"

कभी-कभी हमारा दिल किसी ऐसे कमरे की तरह हो जाता है जहाँ पुरानी यादों और टूटे हुए अरमानों के सिवा कुछ नहीं बचता। यह ग़ज़ल उस उदासी का आईना है, जहाँ वक्त के थपेड़ों ने मकान तो वीरान कर दिए, पर रूह पर उन यादों के निशान अब भी ताज़ा हैं। पन्नों में दबी सूखी मुस्कान और सीने में जलते अरमानों की यह दास्तान उन लोगों के लिए है जो आज भी अपने भीतर एक पूरी कायनात दफन किए खामोश बैठे हैं।

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ग़ज़ल

"मिहराब-ए-सफ़र: ज़िंदगी की नई इबारत"

ज़िंदगी महज़ एक सफ़र नहीं, खुद को खोजने की एक प्रक्रिया है। हम अक्सर मंज़िलों की तलाश में निकलते हैं, लेकिन सफर के दौरान जो 'आफ़ताब' (सूरज/ज्ञान) साथ होता है, वही असल पहचान बन जाता है। 'शशि ऐरी' की यह ग़ज़ल उस मोड़ का दस्तावेज़ है जहाँ इंसान हारकर भी जीत जाता है, क्योंकि उसे खुद में ही इबादत का सुकून मिल गया है। एक खामोश सफर का अंत जब 'गुफ़्तगू' और 'मिहराब' (पवित्र स्थान/नूर) की ओर होता है, तो ज़िंदगी की हर बिसात हसीन लगने लगती है।

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ग़ज़ल

"सुकून-ए-क़ुर्बत: ज़ख्मों का मरहम"

कभी-कभी कोई शख्स ज़िंदगी में एक ऐसी आहट बनकर आता है कि बरसों के जमा किए हुए दर्द भी पल भर में पिघल जाते हैं। यह ग़ज़ल उस जादुई मुलाक़ात का अक्स है, जहाँ आँखों की मदहोशी और एक खामोश इकरार, दिल के पुराने ज़ख्मों के लिए मरहम बन गया। जब साहिल पर खड़ा इंसान लहरों से उलझना छोड़ दे और खुद ख्वाब बनकर वो हक़ीक़त में आ जाए, तो ज़िंदगी बदल जाती है। एक ऐसा अहसास जिसे लफ़्ज़ों में नहीं, रूह में महसूस किया जाता है।

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ग़ज़ल

खामोशी के लफ़्ज़ (खामोशी की जुबान)

यह गज़ल उस स्थिति का वर्णन करती है जब शब्द कम पड़ जाते हैं और मौन (खामोशी) संवाद का सबसे सशक्त माध्यम बन जाता है। अक्सर जो बातें ज़ुबान से नहीं कही जा सकतीं, उन्हें आँखें और रूह की खामोशी बयां कर देती है। यह रचना एक ऐसे प्रेमी या मुसाफिर की दास्तान है, जिसने शोर-शराबे वाली दुनिया को छोड़कर अपनी आत्मा की चुप्पी में सुकून और सच्चाई को ढूँढ लिया है।

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ग़ज़ल

मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़: यादों की दस्तक

कभी-कभी दिल के दरवाज़े उन लोगों के लिए खुल जाते हैं जिन्हें हम बरसों से संजोए हुए अपनी यादों की तिजोरी में बंद रखना चाहते थे। एक ऐसी ही बेबसी और रूहानी दस्तक को बयां करती यह ग़ज़ल—जहाँ यादें महमान नहीं, मुसाफ़िर बनकर रूह में बस जाती हैं। शशि ऐरी की कलम से, एक ऐसा अहसास जो बिना किसी आहट के, आपकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़, आपके दिल का हिस्सा बन गया है।

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ग़ज़ल

वक़्त की सौगात

यह ग़ज़ल मानवीय संबंधों की गहराई, यादों और समय के साथ बदलते हुए जीवन के सफर को बड़ी ही भावुकता से दर्शाती है। ग़ज़ल की शुरुआत एक ऐसी 'दुआ' के साथ होती है जो जीवन का आधार बनी हुई है। जैसे-जैसे शेर आगे बढ़ते हैं, यह उन पुरानी मुलाक़ातों की कसक और किसी के ज़िक्र से दिल के रोशन होने का एहसास दिलाती है।

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ग़ज़ल

तन्हा रात का सफ़र

यह गज़ल उस गहन अहसास को समर्पित है जो रात के सन्नाटे में इंसान को अपने आप से रूबरू कराता है। जब दुनिया सो जाती है, तब यादें और तन्हाई अपना डेरा जमा लेती हैं। इस गज़ल में रात को एक ऐसे आइने की तरह दिखाया गया है, जिसमें मनुष्य अपनी बिखरी हुई ख्वाहिशों और छिपे हुए जख्मों को साफ देख सकता

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ग़ज़ल

इस नज़्म में हमने उस सफ़र को पिरोने की कोशिश की है जहाँ ईश्वर का नूर एक नन्हे शि

इस नज़्म में हमने उस सफ़र को पिरोने की कोशिश की है जहाँ ईश्वर का नूर एक नन्हे शिशु की आँखों में उतरता है, और बपतिस्मा (Baptism) जैसे पवित्र संस्कारों के ज़रिए रूह की गहराई को छूता है। लेकिन क्या आज की इस नफ़रत और सियासत भरी दुनिया में वही रूहानियत कहीं खो गई है? माँ के आँचल में हमने जन्नत का घर पाया।

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ग़ज़ल

शीर्षक: तन्हा रात का सफ़र

शीर्षक: तन्हा रात का सफ़र यह गज़ल उस गहन अहसास को समर्पित है जो रात के सन्नाटे में इंसान को अपने आप से रूबरू कराता है। जब दुनिया सो जाती है, तब यादें और तन्हाई अपना डेरा जमा लेती हैं। इस गज़ल में रात को एक ऐसे आइने की तरह दिखाया गया है, जिसमें मनुष्य अपनी बिखरी हुई ख्वाहिशों और छिपे हुए जख्मों को साफ देख सकता

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ग़ज़ल

मोहब्बत जब मुकम्मल इबादत बन जाती है, तो वह अपने साथ एक ऐसा सन्नाटा लाती है जो इं

मोहब्बत जब मुकम्मल इबादत बन जाती है, तो वह अपने साथ एक ऐसा सन्नाटा लाती है जो इंसान को अंदर तक ख़ामोश कर देता है। चारदीवारी के बीच घिरा हुआ घर भी तब एक वीराना लगने लगता है, जहाँ यादों के सिवा कोई हमसफ़र नहीं होता। लेकिन इस तन्हाई से भी बड़ा एक ख़ौफ़ होता है—दुनिया की नज़रों का ख़ौफ़। आशिक़ पूरी दुनिया से लड़ सकता है, मगर वह डरता है कि कहीं उसकी आँखों की नमी या उसके चेहरे की शिकन उसके महबूब के नाम को सरेआम न कर दे। यह ग़ज़ल इसी ख़ामोश तन्हाई और पाकीज़ा मोहब्बत के उसी अनकहे डर की एक बेहद ख़ूबसूरत

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ग़ज़ल

क़ीमत तय कर दी गई हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ हर चीज़ बाज़ार बन चुकी है और

क़ीमत तय कर दी गई हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ हर चीज़ बाज़ार बन चुकी है और हर जज़्बात की एक है। जब इंसानियत और पाकीज़गी पर भी तिजारत (व्यापार) का साया मंडराने लगे, तो एक शायर का दिल तड़प उठता है। यह ग़ज़ल समाज के इसी गहरे दर्द, गिरते हुए मूल्यों और टूटती हुई अस्मत की एक बेहद संजीदा और बेबाक़ दास्तान है।

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ग़ज़ल

मोहब्बत नाम है मुकम्मल शिद्दत और अटूट विश्वास का। लेकिन जब इस राह में दूरियाँ और

मोहब्बत नाम है मुकम्मल शिद्दत और अटूट विश्वास का। लेकिन जब इस राह में दूरियाँ और ख़ामोशियाँ क़दम चूमने लगें, तो दिल का सबसे बड़ा सहारा 'सब्र' बन जाता है। एक ऐसा सब्र, जो वक़्त के इम्तिहान से डरता नहीं, बल्कि हर गुज़रते लम्हे के साथ और गहरा होता जाता है।शायर 'शशि' की यह ग़ज़ल इसी ख़ामोश मोहब्बत, पाकीज़ा इंतज़ार और बेइंतहा सब्र की दास्तान है। जहाँ उम्मीद का दामन छूटा नहीं और दिल ने हर चोट पर सिर्फ़ मुस्कुराकर यही कहा... 'सब्र हर बार किया'। पेश-ए-ख़िदमत है यह रोमानी और जज़्बाती ग़ज़ल..." मोहब्बत मे

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ग़ज़ल

अक्सर महफ़िलों में शोर बहुत होता है, लेकिन सबसे गहरी बातें वे होती हैं जो कही नह

अक्सर महफ़िलों में शोर बहुत होता है, लेकिन सबसे गहरी बातें वे होती हैं जो कही नहीं जातीं। कुछ जज़्बात लफ़्ज़ों के मोहताज नहीं होते; वे दिल की उस खामोश गलियारे से उपजते हैं, जहाँ ज़ुबान का पहुँचना मुमकिन नहीं होता। हमारी आँखें सिर्फ देखने का ज़रिया नहीं, बल्कि रूह का आईना होती हैं—ये वो खिड़कियाँ हैं जिनसे दिल अपनी पूरी दास्ताँ बयां कर देता है। यह ग़ज़ल इसी 'खामोश गुफ्तगू' का एक दस्तावेज़ है

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